Breaking: CPS पर हाईकोर्ट का कड़ा रुख पद से हटाए जाने के बाद भी सरकारी आवासों पर क्यों जमाया है कब्जा


शिमला-31 दिसंबर. प्रदेश में पद से हटाए गए मुख्य संसदीय सचिवों की तरफ से सरकारी आवास खाली न करने पर हिमाचल हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है. हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा है कि अदालत ने जब सीपीएस को पद से हटा दिया है, फिर वे कैसे अब भी संवैधानिक प्राधिकारियों के खर्चे पर सरकारी आवासों पर कब्जा किए हुए बैठे हैं?

हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश न्यायमूर्ति बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की. इस दौरान खंडपीठ को अवगत करवाया गया कि जिन CPS की नियुक्तियां हाईकोर्ट ने रद्द कर दी हैं, वे अभी भी प्रमुख सरकारी आवासों में रह रहे हैं. अदालत को ये भी बताया गया कि ये सरकारी आवास हाईकोर्ट के निकट स्थित हैं. साथ ही जानकारी दी गई कि इन सरकारी आवासों का उपयोग हाईकोर्ट के उन न्यायाधीशों को आवंटित करने के लिए किया जा सकता है, जिन्हें लंबी दूरी से आना-जाना पड़ता है. इस पर गंभीर संज्ञान लेते हुए खंडपीठ ने हिमाचल प्रदेश सरकार के विशेष सचिव (सामान्य प्रशासन विभाग) को हलफनामा दाखिल करने के आदेश जारी किए.

अदालत ने निर्देश जारी किए कि हलफनामे में सारे तथ्य स्पष्ट किए जाएं. मसलन, कितने पूर्व सीपीएस अभी भी सरकारी आवासों पर काबिज हैं, उनकी नियुक्तियां कब रद्द हुई और उसके बाद से वे कितने समय से आवासों पर रह रहे हैं? साथ ही यह भी बताने को कहा गया है कि क्या इनमें से कोई पूर्व सीपीएस सरकारी आवास का लाइसेंस शुल्क अदा कर रहा है या नहीं? फिलहाल, खंडपीठ ने इस मामले की अगली सुनवाई 16 मार्च 2026 को निर्धारित की है.

अदालत ने कहा था कि सरकार यह समझाने की कोशिश कर रही है कि हाईकोर्ट के न्यायाधीशों के लिए प्रभावी रूप से 13 आवास उपलब्ध कराए गए हैं, जबकि शपथपत्र में केवल 12 आवासों की सूची का ही विवरण है. अब हाईकोर्ट के संज्ञान में लाया गया है कि सीपीएस पद से हटाए जाने के बाद भी सरकारी आवासों पर काबिज हैं.
इससे पहले भी हाईकोर्ट न्यायाधीशों को आवास जैसी मूलभूत सुविधा उपलब्ध न करवाने पर राज्य सरकार के रवैये पर कड़ी टिप्पणी कर चुका है. अदालत ने खेद जताते हुए कहा था कि न्यायपालिका के उत्थान के लिए सरकार से बिना निचोड़े कुछ भी नहीं निकल रहा है. यही नहीं, हाईकोर्ट के न्यायाधीशों को आवास उपलब्ध करवाने से जुड़े एक अन्य मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने सरकार की ओर से दाखिल शपथपत्र पर असंतोष जताया था.


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