शिमला-03सितंबर.प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव व IAS प्रबोध सक्सेना को मुख्य सचिव पद पर छह माह का सेवा विस्तार दिए जाने वाले मामले में केंद्र ने हिमाचल हाईकोर्ट में अपना जवाब दाखिल किया है. केंद्र सरकार की तरफ से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जुड़े अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने पैरवी की. उन्होंने दलील देते हुए कहा कि सेवा विस्तार से पहले भी प्रबोध सक्सेना दो साल तक मुख्य सचिव पद पर रहे. उस समय सक्सेना की तैनाती पर किसी को कोई एतराज नहीं था.
केंद्र सरकार की तरफ से आगे कहा गया कि जब प्रबोध सक्सेना को 6 माह का सेवा विस्तार दिया गया तो हाय-तौबा मच गई. केंद्र ने अपने जवाब में आगे कहा कि एक्सटेंशन की अनुमति सीएम के आग्रह पर दी गई है. ये एक्सटेंशन तय नियमों के तहत छह महीने के लिए दी गई है. एक्सटेंशन की यह अवधि 30 सितंबर को पूरी हो जाएगी.
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति गुरमीत सिंह संधवालिया और न्यायमूर्ति रंजन शर्मा की खंडपीठ ने पूछा कि क्या यह समझा जाए कि अब उन्हें फिर से एक्सटेंशन नहीं दी जाएगी? जवाब में केंद्र सरकार की ओर से बताया गया कि फिलहाल यह नहीं कहा जा सकता. साथ ही केंद्र के जवाब में कहा गया कि अभी तक इस संबंध में राज्य सरकार यानी सीएम की ओर से कोई पत्र नहीं मिला है. हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे में मामले की सुनवाई 30 सितंबर से पहले जरूरी है. यह कहते हुए खंडपीठ ने मामले की आगामी सुनवाई 22 सितंबर को तय की है. इस मामले में राज्य सरकार ने सील्ड कवर में वांछित रिकॉर्ड पेश किया. खंडपीठ ने रिकॉर्ड को देखने के बाद उसे फिर से सील्ड कवर में रखा.
प्रबोध सक्सेना को सेवा विस्तार दिए जाने के खिलाफ अदालत में एक जनहित याचिका दाखिल की गई है. हाईकोर्ट ने इस सेवा विस्तार का औचित्य जानने के लिए केंद्र व राज्य सरकार से संपूर्ण रिकॉर्ड तलब किया था. हिमाचल में भारी बारिश और खराब मौसम के कारण केंद्र सरकार की ओर से रिकॉर्ड पेश नहीं किया जा सका, लेकिन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने खंडपीठ के समक्ष ये कहा कि अनुमति नियमानुसार दी गई है. केंद्र सरकार ने अपने जवाब में कहा है कि जनहित को देखते हुए प्रबोध सक्सेना को सेवा विस्तार देने के राज्य सरकार के आग्रह को स्वीकार किया गया है. वहीं, पिछली सुनवाई के समय अदालत ने केंद्र सरकार से पूछा था कि ऐसे क्या कारण और कौन सा जनहित था, जिसे पूरा करने के लिए सेवा विस्तार दिया गया. हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार सेवा विस्तार देने की अथॉरिटी की जानकारी भी तलब की थी.
बता दें कि हाईकोर्ट में अतुल शर्मा नामक व्यक्ति ने जनहित याचिका दाखिल कर मांग की है कि मुख्य सचिव के तौर पर प्रबोध सक्सेना को 28 मार्च को 6 महीने का विस्तार देने वाले आदेश को रद्द किया जाए. याचिका में रखे गए तथ्यों के अनुसार को भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम राउज एवेन्यू कोर्ट के विशेष न्यायाधीश ने 29 अक्टूबर 2019 को प्रबोध सक्सेना के खिलाफ सीबीआई की तरफ से दाखिल आरोपपत्र का संज्ञान लिया गया था.
प्रार्थी का कहना है कि 23 जनवरी 2025 को सीबीआई ने पत्र जारी कर इस बात की पुष्टि की है कि प्रबोध सक्सेना के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल है और आपराधिक मुकदमा लंबित है. ऐसे में दागी होने के बावजूद इस साल 28 मार्च को केंद्रीय कार्मिक मंत्रालय ने प्रबोध सक्सेना को 30 सितंबर तक मुख्य सचिव के रूप में छह महीने का विस्तार प्रदान करने की अनुमति दी. प्रार्थी का आरोप है कि आपराधिक मुकदमा लंबित होने के बावजूद प्रबोध सक्सेना का नाम संदिग्ध सत्यनिष्ठा सूची यानी ऑफिसर्स विद डाउटफुल इंटेग्रिटी की सूची में शामिल नहीं किया गया. यह संविधान के अनुच्छेद 123 का उल्लंघन का मामला है.
आरोप है कि प्रबोध सक्सेना को सेवा विस्तार को मंजूरी देते समय केंद्र सरकार के समक्ष पूरी सतर्कता रिपोर्ट नहीं रखी गई थी. प्रार्थी का कहना है कि प्रशासनिक सुधारों पर संसदीय समिति ने भ्रष्टाचार की जांच का सामना कर रहे नौकरशाहों को बचाने के लिए सेवा विस्तार के दुरुपयोग के बारे में चिंता जताई है. यह आरोप लगाया गया है कि प्रबोध सक्सेना ने मुख्य सचिव और वित्त सचिव के रूप में अपने कार्यकाल में पद का आधिकारिक दुरुपयोग किया है.
