शिमला-20दिसंबर. राजधानी शिमला में प्रस्तावित रोपवे परियोजना के निर्माण की राह आसान हो गई है। इसकी लंबाई 13.79 किलोमीटर होगी। ये रोपवे दुनिया का दूसरा और भारत का सबसे लंबा रोपवे होगा। इसका निर्माण तारादेवी से शिमला के बीच होगा और शहर के 15 स्टेशन जुड़ेंगे। इस रोपवे के बनने से शिमला में ट्रैफिक जाम की समस्या से काफी हद तक निजात मिलेगी। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री कीर्तवर्धन सिंह ने शुक्रवार को राज्यसभा में बताया कि शिमला शहर में नवोन्मेषी शहरी परिवहन प्रणाली के तहत बनने वाली रोपवे परियोजना को वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम 1980 के तहत प्रथम चरण की सैद्धांतिक मंजूरी दे दी गई है। यह मंजूरी 7 अक्तूबर 2025 को दी गई है। इसके तहत 6.109 हेक्टेयर वन भूमि को गैर-वानिकी उपयोग के लिए परिवर्तित करने की अनुमति दी गई है।
यह जानकारी राज्यसभा सांसद एवं भाजपा के प्रदेश महामंत्री डॉ. सिकंदर कुमार द्वारा पूछे गए सवाल के जवाब में दी गई। डॉ. सिकंदर कुमार ने पूछा था कि क्या शिमला में 1734.70 करोड़ रुपये की लागत से बन रही 13.79 किलोमीटर लंबी रोपवे परियोजना को वन कानून के तहत मंजूरी मिली है, क्या इसमें सभी पर्यावरणीय और कानूनी मानदंडों का पालन होगा, क्या यह ग्रीन हिमाचल विजन के अनुरूप है और क्या इससे युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा होंगे। मंत्री कीर्तवर्धन सिंह ने बताया कि यह परियोजना हिमाचल प्रदेश की रोपवे एवं त्वरित परिवहन प्रणाली विकास निगम द्वारा राज्य सरकार के माध्यम से लागू की जा रही है। उन्होंने कहा कि रोपवे परिवहन एक कम कार्बन उत्सर्जन वाला माध्यम है, जो शहर में वाहनों की संख्या और ट्रैफिक को कम करने में मदद करेगा। इससे वायु प्रदूषण में भी उल्लेखनीय कमी आएगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि रोपवे जैसी प्रणालियां पारंपरिक सडक़ आधारित परिवहन की तुलना में कम ऊर्जा की खपत करती हैं और भूमि पर भी न्यूनतम असर डालती हैं।
केंद्रीय मंत्री ने यह भी कहा कि वन भूमि के गैर-वानिकी उपयोग की अनुमति सख्त पर्यावरणीय शर्तों और उपशमन उपायों के साथ दी गई है। इसके तहत परियोजना के लिए नेट प्रेजेंट वैल्यू (एनपीवी) का भुगतान किया जाएगा, प्रतिपूरक वनीकरण किया जाएगा और मृदा एवं नमी संरक्षण से जुड़े कार्य अनिवार्य रूप से किए जाएंगे, ताकि पर्यावरण को होने वाले नुकसान की भरपाई की जा सके।
