शिमला-05 अगस्त. हिमाचल में पांच बीघा भूमि नियमितीकरण वाली नीति पर प्रदेश हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला आ गया है। प्रदेश हाईकोर्ट ने सरकारी जमीन पर अतिक्रमण को नियमित करने वाले कानून को 23 वर्षों के बाद मनमाना और असांविधानिक घोषित करार करते हुए रद्द कर दिया है। अदालत ने हिमाचल प्रदेश भू-राजस्व अधिनियम की धारा 163-ए और उसके तहत बनाए गए सभी नियमों को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया गया। यह धारा प्रदेश सरकार को सरकारी जमीन पर अतिक्रमण को नियमित करने के लिए नियम बनाने का अधिकार देती थी।अदालत ने महाधिवक्ता को इस फैसले की प्रति मुख्य सचिव और अन्य संबंधित अधिकारियों को तत्काल अनुपालन के लिए भेजने का निर्देश दिए हैं। साथ ही, उन राजस्व अधिकारियों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई करने के भी निर्देश दिए गए हैं जिनकी देखरेख में अतिक्रमण हुआ है। अदालत ने 28 फरवरी 2026 तक सभी सरकारी जमीनों से अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश दिए हैं। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने यह फैसला पूनम गुप्ता और अन्य बनाम हिमाचल प्रदेश मामले में दिया है, जिसमें हिमाचल प्रदेश भू-राजस्व अधिनियम की धारा 163-ए की सांविधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी।
बता दें, राज्य की नियमितीकरण नीति के तहत सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करने वालों लोगों से तत्कालीन प्रदेश सरकार ने आवेदन मांगे थे। इसके तहत भूमि को नियमितीकरण करने के लिए एक लाख पैंसठ हजार से अधिक लोगों ने आवेदन किया था। तत्कालीन भाजपा सरकार ने भू-राजस्व अधिनियम में संशोधन कर धारा 163-ए को जोड़ा जिसे हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है। इसके तहत लोगों को पांच से 20 बीघा तक जमीन देने और नियमितीकरण करने का फैसला लिया गया था, जिससे प्रदेश में जरूरतमंद लोगों को जमीन दी जा सके। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने 8 जनवरी को सुनवाई के बाद इस फैसले को सुरक्षित रख लिया था। याचिकाकर्ता पूनम गुप्ता की ओर से नीति की वैधता को लेकर हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। अगस्त 2002 में दो न्यायाधीशों की खंडपीठ ने प्रकिया जारी रखने के आदेश दिए थे, जबकि पट्टा देने से मना कर दिया था। वहीं, केंद्र सरकार की ओर से दलीलें दी गईं कि प्रदेश सरकार ऐसी नीति नहीं बना सकती।
