युग हत्याकांड मामले में 7 साल पहले जज वीरेंद्र सिंह ने दोषियों को मृत्युदंड की सज़ा सुनाते हुए तोड़ दी थी कलम,जानें यहां


शिमला-23सितंबर. हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में मंगलवार को बहुचर्चित युग हत्याकांड मामले सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान युग के आरोपियों को कोर्ट ने जिला अदालत का फैसला बदला जिसमें एक आरोपी की बरी कर दिया गया जबकि 2 अन्य आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई। लेकिन इस फैसले ने सबको चौंका दिया। इस फैसले के साथ ही शिमला का सबसे बहुचर्चित युग अपहरण और हत्याकांड की जांच में सामने आई दरिंदगी की कहानी याद दिला दी। 14 जून 2014 को दोषियों ने चार साल के मासूम का अपहरण किया और उसके कारोबारी पिता से भारी भरकम फिरौती की मांग की। दोषी हत्या के बाद भी परिजनों से फिरौती मांगते रहे। दोषियों ने 14 जून 2014 को अपहरण करने के बाद 22 जून को युग की हत्या कर दी थी। शातिर और कोई नहीं बल्कि पिता के करीबी और जान पहचान वाले ही थे। अपहरण के बाद मासूम को एक घर में सात दिन तक छिपाकर रखा गया। इस दौरान फिरौती के लिए कई बार पत्र भी लिखे गए। आरोपियों को मासूम को छिपाना मुश्किल हो गया तो उन्होंने उसे कलस्टन में पानी के बड़े टैंक में पत्थर से बांधकर फेंक दिया। अपहरण के 13 दिन बाद पहली बार फिरौती का पत्र युग के जन्मदिन पर 27 जून 2014 को भेजा गया। सादे कागज पर हाथ से लिखकर पत्र को युग के पिता विनोद की दुकान के शटर के नीचे से डाला गया। इस पत्र में 3.60 करोड़ रुपये की फिरौती मांगी गई। निशानी के तौर पर युग का लॉकेट भी भेजा। पत्र में घर में काम करने वाले नौकर का नाम लिखकर उसके पास ही 3.60 करोड़ रुपये अंबाला भेजने के लिए कहा गया। परिजनों ने पत्र मिलते ही नौकर को शाम को ही अंबाला रवाना कर दिया। इस दौरान पुलिस ने उसका पीछा भी किया लेकिन वहां कोई नहीं मिला।

दूसरी बार फिर पत्र भेजकर फिरौती की मांग की गई और मांग स्वीकार होने की स्थिति में परिजनों से घर के बाहर सफेद रंग का कपड़ा लटकाने के लिए कहा गया। तीसरी बार फिरौती का पत्र रक्षा बंधन से पहले भेजा गया। इसके बाद चौथी बार फिर फिरौती का पत्र भेजा गया। दूसरी, तीसरी और चौथी बार भेजे गए फिरौती के पत्र पर चौड़ा मैदान पोस्ट ऑफिस की मुहर लगी थी। हैरानी इस बात की है कि युग हत्याकांड मामले में शिमला पुलिस महीनों तक अपहरणकर्ता को साथ लेकर युग का पता खोजती रही।

युग गुप्ता की हत्या के आरोप में दोषी चंद्र शर्मा, गुप्ता परिवार का पड़ोसी है। युग का अपहरण होने के बाद वह केस में ज्यादा ही दिलचस्पी ले रहा था। बड़ी की चालाकी से वह युग के परिजनों का विश्वासपात्र बन गया। पड़ोसी होने के कारण वह गुप्ता परिवार की हर गतिविधि में भी शामिल रहता। पुलिस और परिजन युग को अगवा करने वालों के खिलाफ क्या रणनीति बना रहे हैं, इसकी पूरी जानकारी उसे थी, लेकिन जब चंद्र शर्मा ने युग के पिता विनोद की चल-अचल संपत्ति की जानकारी जुटाने में दिलचस्पी दिखाई तो परिजनों को उस पर शक हुआ। युग के हम उम्र दोस्त के घर के दरवाजे के साथ चंद्र शर्मा के घर का दरवाजा है। युग की दो बहनें टीशा और भूमि, चंद्र शर्मा के घर इसकी मां से ट्यूशन पढ़ने जाती थीं। सीआईडी ने मामले की गहनता जांच के बाद 20 अगस्त 2016 को अपहरण के करीब दो साल बाद विक्रांत को गिरफ्तार किया। इसकी निशानदेही पर सीआईडी ने कलस्टन पेयजल टैंक से युग का कंकाल बरामद किया। इसी दिन चंद्र शर्मा और तेजेंद्र पाल को भी गिरफ्तार किया गया।

नवबहार के फोरेस्ट रोड पर राम चंद्रा चौक के नजदीक फ्लैट को चंद्र शर्मा ने किराये पर लिया था। सीआईडी को घटना वाले दिन इन तीनों के फोन की लोकेशन नवबहार के उस गुप्त घर की ही मिली थी। अभियोजन पक्ष के मुताबिक इसी स्थान पर अपहरण के बाद युग को छिपाकर रखा गया था। मुश्किल युग को संभालने और उसे छिपाने की थी। यह काम मुश्किल हो गया तो दरिंदों ने 22 जून को उसे मार डाला लेकिन वह फिरौती मांगने की फिराक में लगे रहे।

मासूम युग को इंसाफ दिलाने के लिए शहर के सैकड़ों कारोबारी सड़कों पर उतरे थे। इस दौरान कार्टरोड से लेकर लोअर बाजार तक कारोबारियों ने रैली निकाल कर रोष प्रदर्शन भी किया। युग के पिता विनोद गुप्ता और परिजनों की अगुवाई में कारोबारियों ने राज्य विधानसभा में जाकर तत्कालीन मुख्यमंत्री और हाईकोर्ट में जाकर मुख्य न्यायाधीश से मुलाकात की। कारोबारियों ने मासूम युग के हत्यारों को फांसी देने और उनके परिजनों का सामाजिक बहिष्कार करने की मांग भी रखी। कारोबारियों ने उपायुक्त ऑफिस शिमला के बाहर भी प्रदर्शन किया था।

पांच सितंबर 2018 को जिला एवं सत्र न्यायाधीश वीरेंद्र सिंह ने चार वर्षीय मासूम के हत्यारों को खड़े होकर सजा सुनाई थी। एक-एक कर तीनों की सजा का एलान करने में जज ने करीब दस मिनट का वक्त लिया। सजा पर फैसला सुनाने के बाद जज वीरेंद्र सिंह ने कलम को तोड़कर पीछे की ओर फेंका और सीधे चैंबर की ओर चले गए थे।


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